परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू -

एक दिव्य विभूति

(अवतरण दिवस-17 अप्रैल, 2017)

किसी भी देश की सच्ची संपत्ति संतजन ही होते हैं । ये जिस समय आविर्भूत होते हैं, उस समय के जन-समुदाय के लिए उनका जीवन ही सच्चा पथ-प्रदर्शक होता है । एक प्रसिद्ध संत तो यहाँ तक कहते हैं कि भगवान के दर्शन से भी अधिक लाभ भगवान के चरित्र सुनने से मिलता है और भगवान के चरित्र सुनने से भी ज्यादा लाभ सच्चे संतों के जीवन-चरित्र पढ़ने-सुनने से मिलता है । वस्तुतः विश्व के कल्याण के लिए जिस समय जिस धर्म की आवश्यकता होती है, उसका आदर्श स्थापित करने के लिए भगवान ही तत्कालीन संतों के रूप में नित्य-अवतार लेकर आविर्भूत होते रहते हैं । वर्तमान युग में यह दैवी कार्य जिन संतों द्वारा हो रहा है, उनमें से एक लोकलाडिले संत हैं हमारे श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ योगीराज पूज्यपाद संत श्री आशारामजी बापू ।

एक समय भारत में ऐसा भी आया, जब अज्ञानी उपासक, जैसे शैव तथा वैष्णव धर्मावलंबी अपने इष्ट देवों को लेकर परस्पर कलह करने लगे । शायद इसी के समाधान स्वरूप एक बार माँ पार्वती ने भगवान शिव से पूछा ‘हे महादेव ! आप ही निर्णय लीजिये कि स्वयं आप महान हैं या विष्णुजी ?’ कल्पना कीजिये कि उत्तर क्या होगा ? हमारी सोच से नितांत परे उत्तर था भगवान शिव का । वे बोले :

शिवपूजारतो वापि विष्णुपूजारतोऽथवा ।

गुरुतत्त्व विहिनश्चेत्तत्सर्वं व्यर्थमेव हि ॥

(गुरुगीता-99)

अर्थात् चाहे विष्णु की पूजा में रत हो या शिव की पूजा में, पर जब तक गुरुतत्त्व का ज्ञान नहीं है, तब तक सब व्यर्थ ही है ।

प्रथमन्तु गुरुं पूज्य ततश्चैव ममाचर्नम् ।

कुर्वन सिद्धिं वाप्नोति ह्यन्यथा निश्फलं भवेत् ॥

(श्रीमद् भागवत पुराण )

हाँ ! गुरुसत्ता मुझसे भी महानतम है । इसलिए सर्वप्रथम सद्गुरु की पूजा करो । फिर उसके बाद मेरी अर्चना कर सकते हो । तभी तुम्हारे सारे प्रयास सफल होंगे, सिद्धिदायक होंगे । यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम्हारी सारी सेवा-पूजा निष्फल है ! निष्फल है ! निष्फल है !

शिष्य को उर्ध्वमुखी बनानेवाले एकमात्र सद्गुरु ही हैं । जिनके द्वारा वह ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर अपने जीवन को ज्योतिर्मय कर सकता है । गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और शंकर कहा गया है । इसके पीछे आध्यात्मिक रहस्य यही है कि गुरु अपने शिष्य को ब्रह्मज्ञान प्रदान कर ब्रह्म बनाते हैं । शिष्य के अंतर्जगत में प्रवेश कर गुरू शिष्य का पोषण करते हैं और पग-पग पर उसकी रक्षा करते हैं । इसलिये गुरु विष्णु हैं । शिष्य के दुर्विचारों और दुर्गुणों का संहार करनेवाले गुरु ही महेश अर्थात् शंकर हैं ।

आज समाज में आतंकवाद, अनैतिकता, संकीर्णता, अमानवीय व्यवहार बढ़ते जा रहे हैं । नरेन्द्र से स्वामी विवेकानंद, मुकुंद से परमहंस स्वामी योगानंद का सफर एक गुरु के माध्यम से ही संभव हो पाया । इसलिए समाज को बदलने के लिए व्यक्ति में परिवर्तन लाने हेतु पूज्य बापूजी सदैव दिन-रात लगे हैं । सनातन धर्म के प्रमुख वाहक पूज्य बापूजी द्वारा जो मूलभूत स्तर पर जनसेवा के कार्य किये गए हैं और किये जा रहे हैं, ये वाकई एक अमिट छाप छोड़नेवाले हैं ।

1973 में संत आशारामजी बापू ने अहमदाबाद के पास साबरमती नदी के किनारे पर एक छोटी-सी कुटीया बनाकर समाज-सेवा की शुरुआत की थी । बापूजी की वह छोटी-सी कुटिया, आश्रमों की श्रृंखला और केन्द्रों की एक लम्बी कतारों के रूप में आज पूरे विश्व में फैल चुकी है । संत आशारामजी बापू ने सत्संग के माध्यम से करोड़ों लोगो के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन किये हैं ।

गुरु-शिष्य परंपरा ही आदिकाल से ज्ञानसंपदा का संरक्षण कर उसे श्रुति के रूप में क्रमबद्ध करती आयी है । इसका वर्णन किए बिना साधना-प्रसंग तथा संस्कृति का प्रकरण अधूरा रह जाता है । स्वयं भारत को जगद्गुरू की उपमा इस कारण दी जाती रही है कि उसने विश्व-मानवता का न केवल मार्गदर्शन किया बल्कि ब्राह्मणत्व के आदर्शों को लोगों के जीवन में उतारकर औरों के लिए वह प्रेरणा स्रोत बना ।

गुरु कौन व कैसा हो ? इस विषय में श्रुति कहती है ‘विशारदं ब्रह्मनिष्ठं श्रोत्रियं गुरुमाश्रयेत् ।’ ‘श्रोत्रिय’ अर्थात् जो श्रुतियों के शब्द-ब्रह्म का ज्ञाता हो, उनका तत्त्व समझता हो । ‘ब्रह्मनिष्ठ’ अर्थात् आचरण से श्रेष्ठ ब्राह्मण जैसा, ब्रह्म में निवास करनेवाला हो, जो परोक्ष साक्षात्कार कर चुका हो तथा ‘विशारद’ अर्थात् जो अपने आश्रय में शिष्य को लेकर उस पर शक्तिपात करने का सामर्थ्य रखता हो ।

इस त्रिभुवन में ज्ञानदाता सद्गुरू के लिए देने योग्य कोई उपमा ही नहीं है । उन्हें पारसमणि की उपमा  देना भी योग्य नहीं क्योंकि पारस लोहे को सोना तो बना देता है पर पारस नहीं बना पाता । परन्तु सद्गुरू  अपने चरणयुगल का आश्रय करनेवाले शिष्य को निज साम्य ही दे डालते हैं, स्वयं अपने जैसा बना देते हैं । ज्ञानेश्वरी में उन्होंने योगीराज श्रीकृष्ण द्वारा अपने शिष्य अर्जुन पर बरसाई अनुकम्पा का वर्णन करते हुए गुरु का स्तर-स्वरूप बता दिया है । वे लिखते हैं ‘तब शरणागत भक्त शिरोमणि अर्जुन को उन्होंने अपना सुवर्ण कंकण विभूषित दक्षिण बाहु फैलाकर अपने हृदय से लगा लिया । हृदय-हृदय एक हो गए, इस हृदय में जो था, वह उस हृदय में डाल दिया । द्वैत का नाता तोड़े बिना अर्जुन को अपने जैसा बना लिया ।’

गुरु का हर आघात शिष्य के अहंकार पर होता है तथा वे यह प्रयास करते हैं कि किसी भी प्रकार की डाँट से, पुचकार से, विभिन्न शिक्षणों द्वारा वह अपने समर्पित शिष्य के अहंकार को धोकर साफ कर उसे निर्मल बना दें । प्रयास दोनों ओर से होता है तो यह कार्य जल्दी हो जाता है नहीं तो कई बार अधीरतावश शिष्य गुरु को समझ पाने में असमर्थ होकर भाग खड़े होते हैं । हमारी आध्यात्मिक परंपरा गुरु प्रधान ही रही है । इसी परंपरा के कारण साधना पद्धतियाँ भी सफल सिद्ध हुईं हैं । गुरु-शिष्य परंपरा ने ही इतने नररत्न इस देश को दिए हैं, जिससे हम सब स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं ।

जनार्दन पंत के शिष्य एकनाथ, गहिनीनाथ के शिष्य निवृत्तिनाथ, निवृत्तिनाथ के शिष्य ज्ञानेश्वर, रामकृष्ण परमहंस के शिष्य विवेकानन्द, कबीर के शिष्य रैदास, पूज्य लीलाशाह सद्गुरू के सत्शिष्य पूज्य सद्गुरूदेव आशारामजी बापू जैसे कुछ नाम हैं, जो इस परंपरा में देव संस्कृति के पन्नों में पढ़े जा सकते हैं व जिनका जीवन उनके समर्पण भाव से लेकर गुरु के आत्मभाव के प्रसंग तक अपने आपमें अद्भुत हैं । युगों-युगों तक ये प्रसंग आत्मिक प्रगति के इच्छुक साधकों को प्रेरणा देते रहेंगे, ऐसी माहात्म्यभरी यह पुनीत परंपरा रही है ।

परम पूज्य सद्गुरुदेव बापूजी भी एक ऐसी ही सत्ता के रूप में हम सबके बीच आए हैं । अनेकों व्यक्तियों ने उनका स्नेह पाया, सामीप्य पाया, पास बैठकर मार्गदर्शन पाया, अनेक प्रकार से उनकी सेवा करने का उन्हें अवसर मिला पर जो उनके दक्षिणामूर्ति स्वरूप को एवं सिद्धांत को समझकर उनके निर्देशों के अनुरूप चलता रहा, उसे यह सब न भी मिला हो तो भी आत्मिक प्रगति के पथ पर चल पड़ने का मार्गदर्शन मिलता है । ऐसे साधक साधना क्षेत्र में ऊँचाइयों को प्राप्त हुए । गुरु जो कहें वो कोई विकल्प प्रस्तुत किए बिना, कोई तर्क किए बिना उसे करना ही साधना है ।

(गुरू चरणाश्रित एक साधक)

 

Share on :