Pujya Saiji's Shravan Maas Sandesh.

सावन के महीने में स्वयं के भीतर जाग्रत होने दो, शिवत्व का शक्तिपात...!

                                                                                                -'ओहम्मो'

 

बोलो हर हर महादेव...

जय जय शंकर, हर हर शंकर...

हे भूतनाथ, हे भोलेनाथ,

   हे सोमनाथ, हे आदिनाथ...

      ॐ नमः शिवाय । ॐ नमः शिवाय । ।

       सूरत जेल से, श्रावण के इस पवित्र महीने में आपको इस पत्र के माध्यम से 'नारायण' आपसे उद्घोष कर रहा है 'जय भोले... हर हर महादेव... जय शंकर की... हर हर नमः शिवाय...' कावडयात्रियों को जय भोले, हिमालय में रहनेवालों को मेरा जय भोले, उत्तरांचल - हिमाचल प्रदेश के निवासियों को जय भोले, द्वादश ज्योतिर्लिंगों में निवास करनेवालों को जय भोले, शिव दर्शन करनेवालों को जय भोले... शिवतत्व को जाग्रत करने की चाह रखनेवाले - यात्रा की पीड़ा में 'आह !' कहने के बदले संकट में भी 'वाह' पुकारते हैं - अमरनाथ दर्शन के यात्री हों या कैलाश मानसरोवर के प्रेमी शिवदर्शन प्यासे भक्त हों, मेरा हृदयपूर्वक स्नेह से अभिनंदन ! बहुत -बहुत  साधुवाद शिव साधकों-साधिकाओं को, उपासकों-उपासिकाओं को, सिद्धयोगी व सिद्धयोगिनीयों को, तपस्वियों-तपस्विनीयों को प्रणाम... उनके स्मरण चिंतन करने से मेरा हृदय भाव-विभोर हो रहा है, पुलकित हो रहा है... क्या कहूँ ! शब्द नहीं है मेरे पास, इस अनुभूति को बयां करने के लिए, यदि आपके हृदय में शिव के प्रति थोड़ी-सी भी श्रद्धा है । आपको मेरे हृदय की इस आध्यात्मिक, अलौकिक अवस्था की कल्पना करते हुए ज्यादा देर नहीं लगेगी, ये पक्की बात है !

          श्रावण मास की बधाईयाँ देते हुए और आपके जीवन में शिवत्व के शक्तिपात को घटित होने का संकल्प करते हुए मैं मोटीवेटर महादेव की, स्पेश्यल सुपर पावर शंकर की, आदियोगी रुद्र की, पार्वतीपति परमेश्वर की, अक्का महादेवी के प्रेमी ध्यानयोगी परमशिव की आपसे कुछ पुण्यवार्ता प्रस्तुत करता हूँ । 

         ठहरो ! रुको ! क्षणभर ! आँखे बंद कर लो । आगे का पढ़ने से पहले, अगर आपने अपने तन पर रुद्राक्ष धारण किया हुआ है तो अपने दाहिने हाथों से उसे स्पर्श कर लो । अपने ललाट पर, दोनों आँखों के बीच, तीसरे नेत्र - जहाँ तिलक किया जाता है - रुद्राक्ष का पवित्र स्पर्श कर लो और मन में 'ॐ नमः शिवाय' का ग्यारह बार जाप कर लो । अपने मुख को उत्तर की ओर कर लो - कैलाश की ओर, मानसरोवर की ओर, हिमालय की ओर तब फिर आगे की चर्चा को धीरे-धीरे ध्यान से पढ़ना प्रारम्भ करो । इतनी जल्दी भी क्या है ? और भागम-भाग वाली आधुनिक जीवनशैली ने आजतक दिया भी क्या है ? सिवाय तनाव के, डिप्रेशन के, चिंता के, अनिद्रा के ? शिव से विमुख होकर क्या मिल गया ? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कृत्रिम बौद्धिकता पूरे विश्व के लिए खतरा बढ़ाने जा रही है और देखते ही देखते कुछ वर्षों में पढ़े-लिखे इंटेलिजेंट, टेलेंटेड, ब्रिलियन्ट बेरोजगार लोगों की फौज आपको दुनिया के हर देश में लगभग नजर आयेगी । इस बात को आज के वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है । स्टीफन हॉकिंग एक आज के युग के प्रखर, प्रबुद्ध, महान वैज्ञानिक माने गये हैं, आज के समय में उनकी तुलना अल्बर्ट आइन्स्टीन से की जा सकती हैं । उन्होंने कहा कि मनुष्य जिस विकास की ओर तेजी से दौड़ रहा है यही विकास अंत में मनुष्य का विनाश करेगा । मैं सोचता हूँ क्या शिव से विमुखों का शिव संहार करेंगे ? फिर इसका उत्तर पाता हूँ कि जो शिव से विमुख है तो वे चाहे स्वयं को विकास की ओर तीव्र गति से भागनेवाले विकसित मनुष्य मानें परन्तु वे शिवतत्व से विमुख जन तीव्र गति से विनाश की ओर जा रहे हैं । चलिये, हम अपनी मूल बात की ओर लौटते हैं । घड़ीभर चित्तवृत्ति को शिवमय हो जाने दीजिए और शिव परिवार का चिंतन कीजिए, हो सके तो अपने हाथ-पाँव, मुख धो लीजिए और मैं भी अभी शाम की मधुरिम संध्या वेला पर पवित्र होकर शुद्धान्तकरण से यह लिख रहा हूँ । इस जेल के अंदर मेरी बेरेक में मेरे अलावा अन्य 12 लोग हैं । राम सेवक जी दीप प्रज्वलित कर रहे है । उत्तर दिशा की तरफ दीवार पर टंगी घड़ी में सात बजकर दस मिनट हो रहे हैं । आज का दिन श्रावण शुक्ल सप्तमी है - रविवार है - दि.- 30/7/2017 । देश-विदेश के शिव प्रेमी, शिवतत्व के अनुभवी, शिवपूजन में तत्पर और शिवत्व में प्रतिष्ठित होने की चाह रखनेवाले उन तमाम पुण्यात्माओं को मेरी नजरों के सामने रखकर मैं स्वयं को ही मानो शब्दस्वरूप में साकार करते हुए आपके समक्ष उपस्थित हूँ । आप ऐसा ही समझिये । 

       क्या आप मुझे फील कर रहे हैं ? मुझे महसूस कीजिए, दूर होने के बावजूद मैं शब्द देह बनकर आपके नजदीक, निकट, निकटतम होने का अहसास दे रहा हूँ, शब्दों का जादू बड़ा जबरदस्त है, शब्द अक्षरों से बनते हैं और ऐसा कोई अक्षर नहीं कि जिसे मंत्र न बनाया जा सके, हर एक अक्षर में मंत्र होने की अद्भुत शक्ति निहित है । अतः अक्षर रूपी मंत्रों को जब संवेदनशीलता, परहितपरायणता और अपनत्वयुक्त माधुर्यता का संपुट मिल जाता है तो वही शब्दों की श्रृंखला को जोड़ते हुए वाक्यों की संरचना करते हुए हमारे हृदयों को झंकृत कर देते हैं और मन-मस्तिष्क में नए-नए प्रभावों-विचारों की कल्पनाओं को साकार करते जाते है, मजा आता है तब जब अदृश्य दृश्य मन की आँखों से दृश्यमान होते जाते हैं । विशेष क्या कहूँ - बीज मंत्रों के अक्षरों, शब्दों व वाक्यों में रूपांतरण की प्रक्रिया को जितना भी मैं अबतक जान पाया हूँ । इस विषय पर बहुत कुछ घंटों-घंटों आपको बतला सकता हूँ और चाहूँ तो लिख भी सकता हूँ पर इस विषय पर अभी तो इतना ही, फिर कभी ईश्वर ने चाहा तो विस्तार से बात करेंगें । 

   अभी तो ये पढ़िये - तीन-चार बार,

     हर एक महादेव

     हर हर महादेव

     हर एक महादेव

     हर हर महादेव 

     हर एक महादेव

     हर हर महादेव...

         और तीन-चार बार पढ़िये और शांत हो जाइये, आंखे बंद कर दीजिए और एक-दो मिनट के बाद पुनः आँखे खोलकर आगे का पढ़ियेगा...

      हर एक में छिपा है महादेव ! हर एक में बसा है महादेव ! हर एक में महानता के बीज दबे हैं । हरेक के भीतर एक महादेव है, हर जीव में शिव है बस, जागृति होनी चाहिए ! सत्यं शिवं सुन्दरम् । शिवोहम्... शिवोहम्...सोहम् ।

       क्या जानते हो आप शिव का मतलब क्या है ? विनाश के देव, कला के देव, प्रेम के देव, देवों के देव महादेव शिव, कोई कहता यही सोमनाथ हैं, किसी ने कहा यही महाकाल है, किसी ने कहा ये तो ओंकारेश्वर हैं, किसी ने कहा मल्लिकार्जुन है, तो किसी ने कहा केदारनाथ है, तो किसी ने कहा ये अमरनाथ है, किसी ने कहा तुंगनाथ हैं और सूरत में जहाँ कपिलमुनि का आश्रम था वहाँ के शिवमंदिर में बसे है कंतारेश्वर महादेव, जो कतारगाम क्षेत्र में है, नेपाल में पशुपतिनाथ हैं तो वैसे ही रूप में दर्शन चाहिए तो मध्यप्रदेश के मन्दसौर में चले जाइये, (मैं गया हूँ) वहाँ वही रूप मिलेगा जैसा पशुपतिनाथ का है । भिन्न-भिन्न स्थान, भिन्न-भिन्न स्वरूप लेकिन है वही एक । अनेक रूपों में एक ।

      शिव मतलब 'शून्यता' । शिव मतलब 'खाली जगह' । शिव अर्थात् शून्यावकाश । शिव मतलब अंधकार । इसीलिए अधिकतर शिवलिंग श्यामवर्ण, कृष्णवर्ण अर्थात् काले रंग के होते हैं । अब, आपको सवाल होना भी स्वाभाविक है कि अंधकार को शिव क्यों कहते हैं ? आश्चर्य है न ? कि शिव मतलब अंधकार । कैसे ? कि ईश्वर होकर अंधेरा किस तरह ? ईश्वर तो प्रकाश, उजास होना चाहिये, पर शिव अंधकार है और अंधकार इसीलिये है क्योंकि अंधकार सनातन है । प्रकाश का तो प्रारम्भ भी है और अंत भी है लेकिन अंधकार का न प्रारम्भ है न अंत । शिव भी वैसे ही परम तेज हैं जिसका न आरम्भ है न अंत है । वे आदियोगी हैं और इसीलिए ही वे शून्यावकाश हैं । हरेक 'कुछ' की मर्यादा होती है लेकिन शून्यता की मर्यादा नहीं है । वह अनंत है, जैसे कि शिव हैं । शिव को काला रंग दिया गया, शिव को जहर दिया क्योंकि उसे सभी का स्वीकार है ।

        एस्ट्रोफिज़िक्स में जो ब्लेक बॉडी (थियोरिटिक आइडियल बॉडी जो हरेक - समस्त सभी प्रकार की ऊर्जा को अपने में समाविष्ट कर लेती है किसी भी तरंग लंबाई के बिना) है, वह शिव है ।

        हम लोग मानते हैं कि संसार एनर्जी (energy) पर चलता है और शून्यता मतलब कुछ नहीं, ऊर्जा का अभाव । लेकिन नहीं, क्योंकि शून्यता की भी अपनी ऊर्जा होती है । जहाँ कुछ नहीं होता वहाँ बहुत कुछ हो सकता है । एक छोटे से बीज में विराट वृक्ष सुषुप्त अवस्था में छिपा है । ध्यान से समझिये इस बात को ! आज का विज्ञान शून्यता (शिव) की ऊर्जा को समझने के लिए आज जहाँ भी, जहाँ तक भी पहुँचा है इतने-इतने रिसर्च करने के बाद, लेकिन वह गुथी, वह क्लू, वह पेच, वह पोइन्ट, वह शून्य, वह शून्यता की ऊर्जा कौनसी है ? कैसी है ? कितनी है ? ये प्रश्न अबतक - आजतक पकड़ नहीं पाये हैं । इन सवालों के जवाब उनके पास आजतक नहीं हैं और, उनके सवालों का उत्तर शिव है । शिव है । शिव है । शिव, उस ऊर्जा का तेज स्वरूप है ! वाइब्रेट हो रहे ऊर्जावान नटराज के नृत्य का फिर से तनिक स्मरण कर लीजिये । नटराज का सम्पूर्ण सृष्टि में मानों निरन्तर नृत्य घटित हो रहा है । नटराज के निरन्तर चलते रहने वाले नृत्य में हम इतने घुल-मिल जाएं कि शिव हमारे अस्तित्व के बाहर का तत्व न रहकर स्व-अनुभूति का, आत्म-पहचान का, हिस्सा बन जाएं । ऐसी स्थिति तक पहुँचने के लिए सतत प्रयत्नशील रहो । 

        प्रत्येक ऊर्जा का शोषण भी वहीं है और ऊर्जा का सबसे उत्कृष्ट स्वरूप भी वही है इसीलिये ही वे देवाधिदेव है । 

         अब, बिलपत्र को समझिये । बिलपत्र शिवलिंग पर चढ़ाये जाते हैं । ये रेडियेशन को शोषित करने में सबसे उत्तम हैं और, शिवलिंग पर चढ़ने वाला दूध कभी भी छुआ नहीं जाता (लेकिन यहाँ उर्जास्त्रोत रेडियेटर शिवलिंग की बात है, केवल एक काले पत्थर की नहीं कि जिस पर किसी का पेट भर सके ऐसा दूध चढ़ाने का पुण्य मिलता है) और शिवलिंग को उर्जास्वरूप स्वीकार करने में हो सकता है कि आपको विज्ञान नहीं, धर्म ही दिखाई दे तो भाभा (या कोई भी न्यूक्लियर रिएक्टर जगत का !) ऐटोमिक रिसर्च सेन्टर भी शिवलिंग आकार का है । (और उसका पानी भी दूसरी जगह उपयोग नहीं किया जाता ।)

        ये शिव केवल भगवान ही नहीं हैं अपितु मित्र भी हैं, प्रेमी भी हैं, शिव जोगी भी हैं और वे संसारी भी है और कहा जाता है कि वे जब ध्यान में होते है, किसी का नहीं सुनते तब वे केवल परममित्र नंदी का सुनते हैं । (मंदिर में नंदी के कान में अपनी इच्छा इसीलिए ही कही जाती है ) ये शिव.... राम के जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं हैं, और कृष्ण जैसे पूर्ण पुरुषोत्तम भी नहीं उसके बावजूद शिव के जैसे पति प्राप्त करने के लिए व्रत किये जाते हैं क्योंकि शिव प्रेमी हैं | वे अगर एक क्षण में रौद्र रूप धारण करके तांडव करेंगे तो दूसरी ही क्षण प्रसन्न होकर ‘तथास्तु’ भी कहेंगे | अपनी प्रिया सती के वियोग में उसके शव को कंधों पर उठाकर उस गति तांडव करेंगे कि कैलाश के शिखर से या अलग – अलग बावन कोनों में (क्षेत्रों में) सती के अंग गिरने लगे (जहाँ शक्ति पीठों की स्थापना हुई ) | 

तीनों आँखों से क्रोध के वियोग के अश्रु बहने लगे (रुद्राक्ष को शिव के वे तीसरे नेत्र के आंसू गिने जाते हैं) ऐसे प्रेमी हैं शिव | 

शिव अर्धनारीश्वर हैं क्योंकि वे जगतपिता बनकर जहर भी पीते हैं और जगदंबा बनकर रक्षण भी करते हैं | वे ममत्व की, अपनत्व की मूर्ति हैं | 

भोले – भोले लोगों के नाथ हैं | युगों - युगों तक तपस्या करते ही रहें, - इतने शांत भी हैं और दूसरी ओर अपने तांडव के कंपन से समस्त ब्रह्माण्ड को गति में रखते हैं, पृथ्वी; सूर्य आदि सब ग्रहों की एक निश्चित SPEED उन्हीं से है – इसलिए तो महाकाल हैं | अगर हम उन महाकाल को समझ पाए, उनके तत्व की अनुभूति कर पाए तो काल हमारा क्या बिगड़ेगा ? क्योंकि हम नश्वर से ऊपर उठते चले जाते हैं जैसे ही उनकी कृपा के बनते जाते हैं शाश्वत कल्याण में हमारी प्रतिष्ठा होती चली जाती है | 

शिव मोटिवेटर हैं, लीडर है, महादेव हैं | और वह महानता के बीज हम सबमें भी सुषुप्तावस्था में पड़े हैं | हर हर महादेव बोलते बोलते ये भी समझ है कि हर हर महादेव | सभी में शिव हैं – किसी का बुरा मत करो | किसी का अहित मत करो | जीव और शिव में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है | अज्ञानावस्था में जीव दुःख, पीड़ा, कष्ट पाता है और पूर्ण बोधावस्था में जहर – निंदा – अपमान – तिरस्कार – पीड़ा – कष्ट – तकलीफ – आपदाएं – ये विष भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाता ! 

शव + जीव का उत्तर है शिव | और शिव का भजन, शिवजी की आराधना, शिव की उपासना, शिव की भक्ति करने के लिए कोई जरुरी नहीं है कि आपको लंबी - लंबी यात्रायें करनी ही पड़ें | चारधाम जाना ही पड़े ! द्वादशा ज्योतिर्लिंग की यात्रा गए तो ठीक, ना भी गए तो शिव को कोई शिकायत नहीं है | भोले भक्तों के लिए कृपा करुणा का भंडार सदा खुला है उनके पास ! एक काम करिये - आपके आसपास शिव मंदिर होगा – देखना – कभी शांत होकर सवेरे दोपहर शाम या मध्यरात्रि को या ब्रह्ममुहुर्त में एकाध घंटा दो घंटा – चले जाना, अपने मोबाइल गजेट्स बंद करके – शांत होकर बैठ जाना ! देखना अपने मनको – मन के विचारों को – फिर आँखें – खोलना – शिवलिंग को देखा – और वही आकृति आपके मस्तिष्क की – सिर की है – जो वह है – वही मुझमें है – अनुस्यूत है – भावना करते – करते – मन ही मन शिव - शिव – ॐ नमः शिवाय जाप करते – करते आप निःसंकल्प, निर्विकार, शून्य होते जायेंगे – और इस शुुन्यावकाश को जितना बढ़ा सको बढ़ाना | इस शुन्य में – जितना हो सके टिकना | शून्य ही शिव है – शिव ही सत्य है, वही सुन्दर है | अद्भुत शांति – और आनंद की अनुभूति होगी आपको ! करके देखना ये प्रयोग | जब समय मिले – कम्बल, टाट, का आसन – लेकर जाना किसी शिव मंदिर में ! शिव मंदिर तो ध्यान की श्रेष्ठ जगह है | बिलिपत्र भी तीन पत्ते से लेकर 21 पत्तों तक होते हैं |

      बिलिपत्र के तीन पत्ते – तीनों गुणों से पार जाने का संकेत देते हैं | तीन का महत्व है | तीन पत्ते, तीन लोक, तीन देव, तीन अवस्था ..............

       और बेल फल, बिलपत्र का औषधीय उपयोग भी बहुत है | वात – पित्त – कफ के रोगों का नाश होता है इस पर विस्तार से चर्चा फिर कभी या फिर आपके पास कोई आयुर्वेदिक औषधि से संदर्भित पुस्तक हो या कोई पत्रिका में भी लेख मिल जायेगा | 

        श्रावण के महीने में बिलिपत्र के लिए दौड़ने वालों में से कितने हैं जो बिलिपत्र के पौधों को लगाते हैं ? गर्मियों में मिलते हैं बेलफल | उनमें से निकलने वाले बीजों को संगठित करके सुखा लेते तो बारिश में अपने घर पर ही आप कितने ही बिलिपत्र के पौधे तैयार कर सकते हैं और किसी शिवमंदिर के आसपास, किसी निर्जन भूमि – आपके घर के बाहर – बरामदे – सोसायटी – अपार्टमेंट – फार्म हाउस में लगा सकते हैं | लंबे समय तक वह बिलिपत्र का पेड़ – आपको समाज को फायदा देना रहेगा | 

      कितने होंगे ऐसे लोग जो सावन में सोफ्टड्रिंक को छोड़ने का संकल्प लेंगे ? कितने होंगे कि जो दूध थोडा - सा शिवलिंग पर चढ़ाकर – बाकी का गरीब – बच्चों – वृद्धों – अनाथों – बेसहारा लोगों में बाँटेंगे ? शिवलिंग में शिव को देखते – देखते अपनी दृष्टि को व्यापक भी तो करना होगा – भोले भोले गरीब बच्चों में शिव को देखकर उनको दूधरुपी अमृतपान कराने का भी अच्छा मौका है ये सावन का महीना | हररोज न कर सको तो हर सोमवार तो कर ही सकते हो !

          ये सावन का महिना, शिव भक्ति के साथ शिव कर्मो का श्रवण भी हो, शिवपुराण का कभी अवलोकन-पठन-स्वाध्याय भी हो या कहीं शिव कथा चल रही हो तो ग्रहण कर लेना और अपने भीतर शिव स्थापन कर लेना- और अपने भीतर शिव स्थापन कर लो तो क्या कहना ! बस, थोड़ा-सा प्रयास कीजियेगा महादेव को जागृत करने का | जो शिव ने कहा ऐसे अपने भीतर ही वो सूक्ष्म रूप में हाजिर ही है | केवल एक सोमवार को ही धक्का-मुक्की करके दर्शन कर लेने से ही वे प्रसन्न होंगे और नहीं करोगे तो रूठ जाएगे - ऐसा भी नहीं है | इट्स आल अबाउट कोन्सायन्स एन्ड कर्म | आप जीवन कैसे जीते हो ? अल्प आहार कर सकते हो ? अल्प आहार कर सकते हो? या व्यर्थ का खाना-पीना छोड़ सकते हो ? सिद्धांतों में किस बातों से परहेज करते हो, झूठ-कपट से दूर रहकर उसका उपवास करते हो ? दंभ- पाखंड का त्याग करके सत्य का फलाहार करते हो ? कभी न दिखने वाली चीजे देखने के लिए, न अनकही बातों को सुनने के लिए या अनजानी गहन बातों को समझने के लिए आपके भीतर क्या कभी उत्सुकता-जिज्ञासा प्रकट हुई ? योग के चक्रों के ऊपर प्रज्ञा चक्षु याने अंतर मन का तीसरा नेत्र - खोलने के लिए क्या कभी कोशीश की है ? प्रखर विवेक जागृत करने का प्रयास किया है ? ज्ञान दृष्टि से इस जगत को देखने की कोशिश की है ? अगर नहीं की हो तो करके देखियेगा | इसका प्रयास भी आपको पुण्यात्मा, महात्मा बनने की राह में तेजी से आगे ले जायेगा ! 

      देखिये, शिवतत्व तो पंचमहाभूतों में व्याप्त है | कहानियाँ फिल्मों की नाईं ही इन्टरेस्टींग होती है और फिल्मों की नाईं याद भी रह जाती हैं आसानी से | और कई फिल्में अच्छा संदेश भी देती है | उनकी चर्चा करने में कोई बुरी बात नही है और किसी को दुःखी किये बिना अलग अलमस्त रहकर नए रोमांचक अनुभव लेना भी शिवतत्व ही है | लेकिन जड़ता से उसको चिपके रहने से वास्ताविक का पता नहीं चलता  | शिव ने तो सती के बाद पार्वती के साथ लव मेरेज कर बैठे और ससुर की नाराजगी ओढ़ कर क्रोध में तांडव किया था ? शिव मंदिरों में उमड़ पड़नेवाले शिव भक्त क्यों भभूति के बदले प्रेम की मुक्त अनुभूति और अभिव्यक्ति की प्रेरणा नहीं लेते | शिव-पार्वती, अर्धनारीश्वर या शक्ति उर्फ प्रकृति के साथ पुरुष के मिलन की काम ऊर्जा की प्रेरणा क्यों नहीं लेते ? द्रविड़ संस्कृति में से आर्य बनी हुई प्रजा लिंग और योनि की पूजा का सहज स्वीकार करती है, ऐसे परमात्मा ने विकसित किये हुए यौवन का चुंबन-आलिंगन-प्रदर्शन सेंसरशीप बिना क्यों स्वीकार करते नहीं, यह सवाल है | गुजरात के जाने माने लेखक जय वसावडा ने इस विषय पर स्पष्ट रूप से बहुत कुछ लिखा है | वे कहते हैं इन्हीं कारणों से शिव अपने यहाँ दिखावों के त्यौहारों के मानों मोहताज बन गये हैं, लेकिन उनको जीव के सरताज होना चाहिये | ये सारे रंगीले रूप हैं शिव के ! लेकिन शिव तो ब्रह्मांड में हैं अरे स्वयं ब्रह्मांड एन्ड बियोन्ड हैं | आदियोगी शिव का गर्जन ही तो बिग बैंग है | कोस्मिक चेतना ही उनका नर्तन है | ऊर्जाशक्ति का समागम ही जीवन है, नटराज का नर्तन ही सृष्टि का सर्जन-विसर्जन और रंजन है | कला और क्रांति की साधना में भोलेनाथ का नित्य निरंतर रूद्र-अभिषेक है | महामृत्युंजय मंत्र अर्थात् जप के साथ-साथ अपने अंदर के शिव को प्राप्त करने की तपस्या करना ! तंत्र में शिव कहते है कि अपना तीसरा नेत्र खोलने के लिए ध्यान से स्वयं के होश में जागृत होने का खुराक दीजिये | कभी साक्षीभाव का साक्षात्कार कीजिये | समझिये, ध्यान से इस बात को कि आस्था का विरोध नहीं है और हो भी नहीं सकता, आस्था का विरोध करना भी नहीं चाहिए लेकिन श्रद्धा के नाम पर अंधश्रद्धा और ठगी करना, गुमराह होना स्वयं के साथ ही ठगी करना है | स्वयं को धोखा देना है | मैं विरोध करता हूँ ब्रह्मचर्य के नाम पर जो प्राकृतिक आवेगों का जबरदस्ती से दमन करते हैं वे मानसिक विकृति को प्राप्त होते हैं | इसलिए नीयति और प्रकृति के लिखे हुए प्रकरणों को सहजता से स्वीकार कीजिये और ब्रह्मचर्य के नाम पर प्राकृतिक सहज वृत्तियों के दमन के बदले ब्रह्म में-शिव में-परमात्मा में अपनी वृत्तियों को प्रतिष्ठित कीजिये तब संसारिक होते हुए भी, परिवारयुक्त होते हुए भी अनुभूति होगी - गा उठोगे - 

“चिदानन्दरूपः शिवोहम् शिवोहम् !

       “मेलूहा” से महादेव को गोड बनानेवाले अमिष त्रिपाठी को पढ़नेवाली आज की जनरेशन की लड़की 'झरना मुंगेरा' - शायद आप जानते हैं या नहीं - पर वो जिसको पढ़कर लिखना सीखी है ऐसे लेखक को बिना परिचय के सायंस से संस्कृत तक के संदर्भो के पठन से वह इम्प्रेस कर सकती है | शिव के नाम पर उस लड़की ने आज की पीढ़ी के विचारों का मानो चित्रण किया है | क्या कहती है ये ‘शक्ति’ शिव के बारे में ? पढ़िये, उसकी कविता – उसके रिफाइन्ड न सही, फाइन पोएम को पढ़िये और समीक्षा कीजिए – स्वयं सोचिये कि ये जनरेशन ‘शिवाय’ जैसी कंगाल फिल्म को रिजेक्ट कर सकती है लेकिन ‘शिवत्व’ को सिलेक्ट कर सकती है । इसे देखकर मेरा मन कहता है कि ‘झरना’ पर कैलाशपति की कृपा बरस रही है... और क्यों न बरसे ! भोलेनाथ तो भोले भंडारी हैं ही - उनका नाम लो, जप करो, महिमा सुनो और उनकी कृपा प्राप्त करो ।

शिव शिव शिव शिव शिव -

हर हर महादेव !

कैसा लगा ये सावन का प्रसाद ? हो गई मौज ?

      सोहम् ! शिवोहम् !

      आनंदोहम् !

      शाश्वतोहम् !

     शांतोहम् !

     नित्य मुक्तोहम् !

स्वयं को every time shiv से connected रियलाइज करो - यही महाशिव है |

और अब पेश है झरना मुंगरा की कविता ('मुखवास' भोजन के बाद होता है)

 

वो शिव है ।

एक तरफ आरम्भ है

एक तरफ अंत है,

बीच में जो ज्ञान है

वही तो सारा सार है,

आरम्भ का जो अंत है 

वही सदी वही क्षण है 

वो शिव है ।

ना मृत्यु है ना जीव है,

ना हृदय ना शव है,

गर शव में जीव आ गया,

वो रो राग गा गया,

वो राग ना बेराग है,

वही सर्जन वृजन है,

वो शिव है ।

वो नृत्य में श्रृंगार है,

बिना का वो ही तार है,

माथे पे सोम छा रहे,

वो आग का मल्हार है,

प्रेम का वो राग है,

सती का वो उपहार है,

वो शिव है ।

कैलाश बर्फ शांत है,

तांडव का पर आक्रन्द है,

गंगा का नीर बह रहा,

पास पर भजंग है,

अमृत नहीं जो हल चूने,

वही तो पूर्ण नीलकंठ है,

वो शिव है ।

भीतर जो छुपा है कुछ,

वो त्वचा भभूत है,

उसके-इसके सबके अंदर

जगता जो त्रिशूल है,

हर-हर में हरमे श्वास का,

चेतना का झरना मूल है,

वो शिव है ।

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