Highlights of April 2017 issue of Vishvguru Patrika

बापूजी धरती पर क्यों अवतरित हुए

पूज्य श्री नारायण साई जी के मार्गदर्शन में प्रकाशित मासिक पत्रिका विश्वगुरु ओजस्वी के अप्रैल २०१७ के अंक में पूज्य संत श्री आसाराम जी बापू के अवतरण दिवस पर विशेष सामग्री का प्रकाशन किया गया है. जिसमे यह समझया गया कि पूज्य बापूजी इस स्वरूप में धरती पर क्यों अवतरित हुए है...जिसके कुछ चुनिन्दा अंशों का यंहा हम समीक्षा में प्रकाशन कर रहे है...

विश्व के कल्याण के लिए जिस समय जिस धर्म की आवश्यकता होती है, उसका आदर्श स्थापित करने के लिए भगवान ही तत्कालीन संतों के रूप में नित्य-अवतार लेकर आविर्भूत होते रहते हैं । वर्तमान युग में यह दैवी कार्य जिन संतों द्वारा हो रहा है, उनमें से एक लोक लाडिले संत हैं हमारे श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ योगीराज पूज्यपाद संत श्री आशारामजी बापू ।

आज समाज में आतंकवाद, अनैतिकता, संकीर्णता, अमानवीय व्यवहार बढ़ते जा रहे हैं । नरेन्द्र से स्वामी विवेकानंद, मुकुंद से परमहंस स्वामी योगानंद का सफर एक गुरु के माध्यम से ही संभव हो पाया । इसलिए समाज को बदलने के लिए व्यक्ति में परिवर्तन लाने हेतु पूज्य बापूजी सदैव दिन-रात लगे हैं । सनातन धर्म के प्रमुख वाहक पूज्य बापूजी द्वारा जो मूलभूत स्तर पर जनसेवा के कार्य किये गए हैं और किये जा रहे हैं, ये वाकई एक अमिट छाप छोड़नेवाले हैं ।

1973 में संत आशारामजी बापू ने अहमदाबाद के पास साबरमती नदी के किनारे पर एक छोटी-सी कुटीया बनाकर समाज-सेवा की शुरुआत की थी । बापूजी की वह छोटी-सी कुटिया, आश्रमों की श्रृंखला और केन्द्रों की एक लम्बी कतारों के रूप में आज पूरे विश्व में फैल चुकी है । संत आशारामजी बापू ने सत्संग के माध्यम से करोड़ों लोगो के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन किये हैं ।

गुरु-शिष्य परंपरा ही आदिकाल से ज्ञानसंपदा का संरक्षण कर उसे श्रुति के रूप में क्रमबद्ध करती आयी है । इसका वर्णन किए बिना साधना-प्रसंग तथा संस्कृति का प्रकरण अधूरा रह जाता है । स्वयं भारत को जगद्गुरू की उपमा इस कारण दी जाती रही है कि उसने विश्व-मानवता का न केवल मार्गदर्शन किया बल्कि ब्राह्मणत्व के आदर्शों को लोगों के जीवन में उतारकर औरों के लिए वह प्रेरणा स्रोत बना ।

जनार्दन पंत के शिष्य एकनाथ, गहिनीनाथ के शिष्य निवृत्तिनाथ, निवृत्तिनाथ के शिष्य ज्ञानेश्वर, रामकृष्ण परमहंस के शिष्य विवेकानन्द, कबीर के शिष्य रैदास, पूज्य लीलाशाह सद्गुरू के सत्शिष्य पूज्य सद्गुरूदेव आशारामजी बापू जैसे कुछ नाम हैं, जो इस परंपरा में देव संस्कृति के पन्नों में पढ़े जा सकते हैं व जिनका जीवन उनके समर्पण भाव से लेकर गुरु के आत्मभाव के प्रसंग तक अपने आपमें अद्भुत हैं । युगों-युगों तक ये प्रसंग आत्मिक प्रगति के इच्छुक साधकों को प्रेरणा देते रहेंगे, ऐसी माहात्म्यभरी यह पुनीत परंपरा रही है ।

परम पूज्य सद्गुरुदेव बापूजी भी एक ऐसी ही सत्ता के रूप में हम सबके बीच आए हैं । अनेकों व्यक्तियों ने उनका स्नेह पाया, सामीप्य पाया, पास बैठकर मार्गदर्शन पाया, अनेक प्रकार से उनकी सेवा करने का उन्हें अवसर मिला पर जो उनके दक्षिणामूर्ति स्वरूप को एवं सिद्धांत को समझकर उनके निर्देशों के अनुरूप चलता रहा, उसे यह सब न भी मिला हो तो भी आत्मिक प्रगति के पथ पर चल पड़ने का मार्गदर्शन मिलता है । ऐसे साधक साधना क्षेत्र में ऊँचाइयों को प्राप्त हुए । गुरु जो कहें वो कोई विकल्प प्रस्तुत किए बिना, कोई तर्क किए बिना उसे करना ही साधना है । ( सम्पूर्ण लेख पेज 17 पर )

अंक की अन्य पठनीय सामग्री में....

माँ के दुग्ध को लेकर बेंक, ओजस्वी आध्यात्म, वर्तमान शिक्षा में परिवर्तन, विश्व को ओजस्वी कुशल प्रतिभाएं, शोध और अविष्कार, ऐतिहासिक दिवस, शास्त्रीय नृत्य कला, संभवामि युगे युगे, समाज की सेवा ही सबसे बड़ा कर्म, योगलीला, वसुंधरा का करें सम्मान, संतों के अमृतवचन, कर्म से तत्वज्ञान, अनोखी कसौटी, आत्मा क्या है, भक्त बहिना बाई, सुखी गृहस्थाश्रम, करें प्राणीमात्र की सेवा, स्वास्थ्य जाग्रति सहित अन्य आकर्षण.

 

Courtesy : www.ojaswihaibharat.org

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