Pujya Saiji writes letter to PM Modi for constitution of National Male Commision.

 

महोदय,

भारत में चार राज्यों के 2017 विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की महाविजय पर आपको खूब खूब शुभकामनाएं. आपके स्पष्ट दृष्टिकोण व कुशल नेतृत्व में भारत बेहतर वर्तमान एवं उज्जवल भविष्य के निर्माण की एतिहासिक ऊंचाई प्राप्ति करे, ऐसी आशा करता हूँ.
भारत में महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए कदम उठाये जा रहे हैं और उनको लागू किया जा रहा है. यह अच्छी बात है. बेटी बचाओ- बेटी पढाओ का दृष्टिकोण अच्छा है और ऐसा होना आवश्यक भी है ताकि भारत में रहने वाली सभी महिलाओं को सम्मान मिले, व उनका जीवन उन्नत हो. पुरुषों-द्वारा होते अत्याचार से उनकी सुरक्षा हो ये आवश्यक भी है...
इस प्रक्रिया में मैं आपको ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि इसमें एक बात का विशेष ध्यान रखना बहुत ज़रूरी हो गया है कि कई महिलाएं अपने अधिकारों और अपनी सुरक्षा के लिए बने कानूनों का भारी दुरूपयोग भी कर रही हैं. 2012 के निर्भया गैंग रेप के बाद महिला सुरक्षा के कानूनों को एक व्यापक जनआन्दोलन द्वारा उठी मांग के चलते अत्यंत कड़ा कर दिया गया. इससे महिलाओं को सुरक्षा कवच मिला, परन्तु एक बहुत बड़ी हानि भी साथ में हो गयी. इन कड़े कानूनों का पुरुषों के विरुद्ध दुरूपयोग होना शुरू हो गया और कितने ही सामान्य व प्रतिष्ठित निर्दोष पुरुषों के ऊपर महिलाओं ने झूठे छेड़छाड़, यौन उत्पीडन, यौन शोषण एवं बलात्कार के केस दर्ज करके उनको फंसा दिया. पुरुषों को कारावास भिजवा दिया, पुरुषों की छवि समाज में धूमिल कर दी. इन कानूनों से पुरुषों को ब्लैकमेल करना शुरू हुआ है.
पिछले 3-4 वर्षों में भारत में जितने भी बलात्कार के केस दर्ज हुए उनमें से अधिकतर झूठे पाए गये, इसके कई प्रमाण समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल्स में आये दिन देखने को मिल रहे हैं. (जिसके कुछ अंश इस पत्र के साथ संलग्न हैं). दिल्ली सेशंस कोर्ट की न्यायाधीश – श्रीमती निवेदिता अनिल शर्मा, ने पिछले वर्ष, 2016, में एक झूठे बलात्कार केस के आरोपी को निर्दोष बरी करते हुए निर्देश दिया कि : “No one discusses the dignity and honour of a man as all are fighting for the rights of women. Where's the law to protect a man from a woman when he is being persecuted and implicated in a false case? Perhaps, it's time to take a stand,"
अनुवाद : “आज कोई भी पुरुष के सम्मान और गौरव के विषय पर चर्चा नहीं करता क्योंकि सभी महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं. कोई ऐसा कानून क्यूँ नहीं है, जिसमे एक पुरुष को सुरक्षा मिले. यदि कोई महिला उस पर झूठा बलात्कार केस लगा कर उसको प्रताड़ित करती है. अब वक़्त आ गया है कि इस विषय में ठोस कदम उठाया जाएँ.”
दिल्ली महिला आयोग ने 2014 में एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमे यह सामने आया कि 2013 में दिल्ली में दर्ज हुए बलात्कार के 53% केस झूठे और फर्जी थे.
POCSO -Protection of Children from Sexual Offences Act- जैसी गंभीर धारा का भी महिलाएं बेशर्मी से दुरूपयोग करती हैं. हाल ही में यह ज्ञात हुआ कि 2013 में मुंबई, थाणे की एक लड़की ने अपने पिता पर बलात्कार और POCSO की धारा लगा कर केस कर दिया. उसके पिता को 3 साल जेल में कैद करके रखा गया परन्तु दिसम्बर 2016 में उस आरोप लगाने वाली लड़की ने कोर्ट के सामने यह स्वीकार किया कि उसने यह शिकायत अपने पिता के साथ झगडा होने के बाद, उनसे बदला लेने की इच्छा से दर्ज की थी. मुंबई कोर्ट ने निर्देश दिए : "A strong message should be given to society that the POCSO Acts should not be misused," – “समाज को एक महत्वपूर्ण सन्देश पहुंचना चाहिए कि POCSO धारा का दुरूपयोग न हो.”
दिल्ली के सत्र न्यायधीश श्री संजीव जैन ने भी 2016 में एक तलाकशुदा महिला के साथ बलात्कार करने के आरोपी को बरी करते हुए कहा कि कई मामलों में सहमति से बना संबंध टूटने पर महिलाएं कानून को 'बदले के हथियार' के रूप में इस्तेमाल करती हैं.
दिल्ली उच्च न्यायालय की वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन के मुताबिक, दिल्ली में इस तरह के मामले दर्ज होने की संख्या में वृद्धि देखी जा रही है. अपने अनुभव से जॉन कहती हैं कि इन मामलों में से ज्यादातर ऐसे लोग दर्ज कराते हैं, जो एक आदमी के साथ अपने कई वर्षों के रिश्ते के दौरान सहमतिपूर्वक सहवास करते रहे थे. वो इस बात पर तर्क देती हैं, 'हमें इस तरह के हर मामले की और भी सावधानी से जांच करने की जरूरत है क्योंकि हममें से सभी को शादी के अपने फैसले को कभी भी बदलने का हक है.'
हाल ही में 8 फरवरी 2017 को प्रसारित हुई बीबीसी की एक खबर में भारतीय डाटा जर्नलिस्ट रुक्मिणी श्रीनिवासन की बलात्कार केसों से सम्बन्धित जांच रिपोर्ट के कुछ अंश पेश किये गये. रुक्मिणी श्रीनिवासन ने दिल्ली में दर्ज किये 460 बलात्कार के केसों की जांच की, जिसमे उन्होंने पाया कि 460 में से केवल 12 केस ही ऐसे थे जो वास्तविक बलात्कार के केस थे, जिनमे किसी अनजान व्यक्ति ने किसी महिला का यौन शोषण किया था. अधिकतर दर्ज किये हुए केसों में महिला ने पुरुष से आपसी सहमति से सम्बन्ध बनाये थे परन्तु महिला के माता पिता के दबाव के कारण लड़की ने पुरुष के विरूद्ध रेप केस दर्ज किया. और कुछ केस महिलाओं ने तब दर्ज किये जब आपसी सम्बन्ध बनाने के बाद पुरुष ने शादी करने से मना कर दिया. शेष कुछ केस महिलाओं ने पुरुषों से पैसे निकलवाने की लालच से और उनसे किसी आपसी अनबन के विरुद्ध बदला लेने के उद्देश्य से दर्ज किये.
बीबीसी की इसी रिपोर्ट ने कई Men Rights Activists के भी विचार प्रस्तुत किये...जिसमे एक प्रमुख Men Rights Activist पार्थ साधुखान ने यह बताया “Today the definition of rape has changed so much and anything and everything is reported as rape” – “आज कल बलात्कार की परिभाषा इतनी बदल चुकी है कि किसी भी घटना को बलात्कार कह दिया जाता है.” (http://www.bbc.com/news/magazine-38796457)
दिल्ली की नयायाधीश श्रीमती निवेदिता अनिल शर्मा ने बलात्कार के एक आरोपी वकील को निर्दोष बरी करते हुए यह भी कहा कि “It can’t be ignored that the accused, a lawyer, due to this case... has suffered humiliation, distress and misery besides expenses of litigation. His plight may also continue after his acquittal as his implication may have caused an uproar in society but his acquittal may not even be noticed. He would continue to suffer the stigma of being a rape case accused.”
अनुवाद: “यह नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता कि आरोपी, जो कि एक वकील है, उसने केस में पैसा खर्च करने के अतिरिक्त अपमान, दुःख और परेशानी का भी सामना किया है. उसकी दुखद स्थिति निर्दोष बरी होने के बाद भी बनी रहेगी क्योंकि उस पर लगे इन आरोपों की चर्चा समाज में जोर शोर से हुई थी, पर उसके निर्दोष बरी होने की बात पर शायद लोग इतना ध्यान नहीं देंगे. बलात्कार आरोपी होने का कलंक उसको आगे चलकर भी सहन करना पड़ेगा.”
मान्यवर, यह प्रेक्षण बहुत गंभीर और पूर्णतः सत्य है. महिलाएं प्रतिष्ठित पुरुषों से कोई स्वार्थ सिद्ध करने, पैसे ऐठने या उनसे कोई बदला लेने की गलत मंशा से बलात्कार के झूठे केस दर्ज करके उनको पूरे समाज में बदनाम कर देती हैं. बाद में यदि यह भी सिद्ध हो जाये कि पुरुष पर लगा केस पूरी तरह फर्जी था तब भी समाज में हुई पुरुष की बदनामी, प्रतिष्ठा पर उठे संदेह, केस के चलते कोर्ट अथवा जेल में नष्ट हुआ समय और पैसा, इसकी भरपाई होनी कठिन हो जाती है. किसी निर्दोष पुरुष को यदि इन कारणों से जेल जाना पड़ता है तो उसको कितनी शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना होती होगी, उसके सगे सम्बन्धियों, परिवार को और समाज में उसको मानने वाले लोगों को कितना नुक्सान और वेदना होती होगी, इस बात का अनुमान लगाना भी बहुत कठिन है. इसलिए यह भी आवश्यक है कि जब तक किसी पुरुष पर इस प्रकार के (बलात्कार, यौन शोषण, आदि) के आरोप सिद्ध न हो जाएँ तब तक पुरुष की पहचान भी गुप्त रखी जाये, जिस प्रकार आरोप लगाने वाली महिला की पहचान गुप्त रखी जाती है. पुरुष की पहचान गुप्त न रख कर हम भारतीये संविधान की धारा 14 का हनन करते हैं, जो सबको समानता का अधिकार देती है. जैसे यौन उत्पीडन और यौन शोषण का आरोप लगाने वाली महिला की पहचान गुप्त रखी जाती है. उसी प्रकार पुरुष की पहचान भी गुप्त रखी जानी चाहिए जबतक कि न्यायालय में आरोप सिद्ध न हो जाए ! झूठे आरोप लगाने वाली महिलाओं पर भी न्यायालयों को कडा रुख अपनाना चाहिए व झूठा आरोप पाए जाने पर उनको दण्डित भी किया जाना चाहिए.
मान्यवर, अब ये सबसे महत्वपूर्ण हो गया है कि पुरुषों की सुरक्षा और अधिकारों के लिए “राष्ट्रीय पुरुष आयोग” का गठन हो, जिसके माध्यम से पुरुष अपने आपको महिलाओं द्वारा रचे झूठी साजिशों और षड्यंत्रों से बचा पाने में सक्षम अनुभव कर सकें. जिस प्रकार कृषि मंत्रालय को आपने कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय बनाया इस प्रकार राष्ट्रीय महिला आयोग को – “राष्ट्रीय महिला व पुरुष आयोग” भी बनाया जा सकता है, जिससे समानता से समीक्षा की जा सके.
यदि किसी महिला के साथ कुछ गलत होता है तो उसकी तत्कालीन सुरक्षा और सहयोग के लिए महिला सुरक्षा के कानून हैं और साथ ही राष्ट्रिय महिला आयोग जैसी एक भारतीय संवैधानिक निकाय है. राष्ट्रिय महिला आयोग शिकायत या स्वतः संज्ञान के आधार पर महिलाओं के संवैधानिक हितों और उनके लिए कानूनी सुरक्षा उपायों को लागू कराती है. भारतीय समाज में जिस प्रकार निर्दोष पुरुषों के विरुद्ध बलात्कार के झूठे आरोपों और अन्य महिला सुरक्षा के कानूनों का दुरूपयोग का प्रचलन तेज़ी से बढ़ता जा रहा है, उस सन्दर्भ में अब यह अति आवश्यक हो गया है कि एक “राष्ट्रीय पुरुष आयोग” का भी भारतीय संवैधानिक निकाय की शैली से तत्कालीन गठन हो, जिससे निर्दोष पुरुषों को सुरक्षा कवच प्राप्त हो और वह प्रताड़ना के शिकार होने से बच पाएं.
एक वर्ग की सुरक्षा दुसरे वर्ग की वेदना का कारण न बने, इस बात पर विशेष ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, यह वर्तमान समय की मांग है. आशा है कि आप इस विषय की गंभीरता को समझते और परखते हुए जल्द ही “राष्ट्रिय पुरुष आयोग” के गठन व संसद में पुरुषों पर दर्ज होते झूठे बलात्कार व यौन शोषण के केसों से पीड़ित पुरुषों के बचाव के लिए कानून बनाने और इस समस्या का समाधान निकालने की दिशा में शीघ्रता से कदम उठाएंगे ! पुरुषों के बचाव के लिए बलात्कार के कड़े कानूनों में संसद में संशोधन करावें, जिससे निर्दोष पीड़ित पुरुष महिलाओं द्वारा बदइरादे से लगाये संगीन झूठे आरोपों से स्वयं का संरक्षण कर सकें.
आपके उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घायु की मंगलकामना के साथ...
- नारायण साईं
 

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